अचानक आई फ्लैश फ्लड
मुख्य बिंदू:
— नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने खासकर नेपाल-चीन सीमा के हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचाई है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार मृतकों और लापता लोगों की संख्या लगातार बदल रही है, क्योंकि खोज एवं बचाव अभियान जारी है।
— शुरुआती जांच के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत आपदा के दौरान शुरू के 30 मिनट में ही बाढ़ का जलस्तर 9 मीटर ऊंचा हो गया. मलबा, बोल्डर और विध्वंसक ताकत इसी पानी में छुपे थे.
— अचानक आई फ्लैश फ्लड — बाढ़ 26 अगस्त की सुबह बेहद तेजी से आई, जिससे लोगों को संभलने का बहुत कम समय मिला।
— मुख्य प्रभावित क्षेत्र — रासुवा, नुवाकोट और धादिंग समेत उत्तरी नेपाल के इलाके गंभीर रूप से प्रभावित हुए। भोटे कोशी—ल्हेन्दे नदी क्षेत्र में भारी मलबा और पानी नीचे की ओर आया।
— हिमनद और बर्फ-चट्टान के ढहने की भूमिका — शुरुआती वैज्ञानिक आकलनों में ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान के बड़े हिस्से के टूटकर नदी में गिरने और उसके बाद मलबे के साथ अचानक जलप्रवाह बढ़ने को प्रमुख कारण बताया गया है।
— भारी जनहानि — 27 अगस्त तक नेपाल सरकार के एक आधिकारिक अपडेट में 175 शव मिलने और 624 लोगों के 32 देशों से लापता होने की जानकारी थी; बाद की रिपोर्टों में मृतकों की संख्या इससे काफी अधिक बताई गई है। आंकड़े लगातार अपडेट हो रहे हैं।
— विदेशी नागरिक भी प्रभावित — बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री प्रभावित हुए, जिनमें भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। कैलाश-मानसरोवर यात्रा से जुड़े लोगों के प्रभावित होने की खबरें हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह — सड़कें, पुल, घर, स्कूल, अस्पताल, बिजली परियोजनाएं और संचार व्यवस्था बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई हैं।
— भारत के लिए भी चिंता — नेपाल की नदियां आगे चलकर भारत में प्रवेश करती हैं। इसलिए बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती तथा नदी किनारे के इलाकों में जलस्तर और बाढ़ के खतरे पर नजर रखी जा रही है।
— जलवायु परिवर्तन का सवाल — विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ता तापमान हिमालयी ग्लेशियरों और पर्माफ्रॉस्ट को अस्थिर कर रहा है, जिससे इस तरह की अचानक आने वाली आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
— बच्चों पर बड़ा असर — UNICEF के अनुसार 17,000 से अधिक बच्चे प्रभावित हुए हैं और उनके सामने बीमारी, कुपोषण तथा अन्य मानवीय संकटों का जोखिम है।
— बचाव अभियान जारी — नेपाल में सेना, सुरक्षा बल और राहत एजेंसियां खोज, बचाव, निकासी और चिकित्सा सहायता में जुटी हैं। दुर्गम पहाड़ी भूगोल और क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण राहत कार्य चुनौतीपूर्ण है।
— सबसे बड़ी सीख: यह केवल सामान्य मानसूनी बाढ़ नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर/मलबा-प्रेरित अचानक बाढ़ का गंभीर उदाहरण है। इससे नेपाल के साथ-साथ भारत के हिमालयी और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम और सीमा-पार आपदा प्रबंधन की जरूरत सामने आती हैनेपाल और तिब्बत के सीमांत इलाक़े में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर टूटने को एक बड़ी वजह बताया है.

नेपाल और तिब्बत में 26 अगस्त को आई विकराल प्राकृतिक आपदा के बाद, एक तरफ खौफ के साये में राहत और बचाव का काम चल रहा है, तो दूसरी तरफ कई देशों के वैज्ञानिक भी अपने अपने दफ्तरों में बेहद व्यस्त नजर आ रहे हैं. उनकी मेजों और कंप्यूटरों में सैटेलाइट तस्वीरें, हादसे के वीडियो और ग्राउंड लेवल का डाटा है. इन सबकी मदद से वे जानना चाहते हैं कि ग्यिरोंग बॉर्डर के पास ये भयानक आपदा आखिर कैसे ट्रिगर हुई. 26 अगस्त की आपदा के दौरान 30 मिनट के भीतर पानी की नौ मीटर ऊंची दीवार खड़ी हो गई.
हादसे से ठीक पहले अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने नेपाल-तिब्बत के ग्यिरोंग बॉर्डर के पास 5.2 तीव्रता वाला भूकंप दर्ज किया. इस डाटा और सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण करने के बाद ऑस्ट्रिया की ग्रात्स यूनिवर्सिटी के भूविज्ञानी याकोब श्टाइनर कहते हैं, "ग्लेशियर का निचला हिस्सा ढह गया. अगर आप तस्वीरें देखेंगे तो ऐसा दिखेगा जैसे किसी ने बड़े से चाकू से पूरा निचला हिस्सा काटकर कर गिरा दिया हो."
श्टाइनर के मुताबिक, इतनी ऊंचाई से गिरी ग्लेशियर बर्फ का बड़ा हिस्सा, वैसा ही असर करता है जैसे बम धमाका करता है. श्टाइनर के मुताबिक, नेपाल तिब्बत के इस इलाके में आपदाओं का इतिहास रहा है. इसी घाटी के आस पास 2024 में बर्फ और चट्टानें वाला हिमस्खलन हुआ. 2025 में भी एक ग्लेशियर झील से बाढ़ उपजी.
— वैज्ञानिकों ने बीबीसी को बताया कि शुरुआती जांच पता चला है कि ग्लेशियर टूटने से बर्फ़ तेजी से पिघली होगी. शुरुआती रिपोर्टों के कारण कई लोगों का मानना था कि एक भूकंप के कारण भूस्खलन हुआ था. हालांकि, यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) ने बाद में स्पष्ट किया कि यह आपदा 'हिमनद के एक हिस्से के टूटने' के कारण हुई.
यूएसजीएस के आंकड़ों और घटना का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक़, एक विशाल ग्लेशियर के घाटी की तलहटी से टकराने का असर 5.2 तीव्रता वाले भूकंप जितना था.
डंडी विश्वविद्यालय में ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. साइमन कुक ने बीबीसी को बताया कि उनकी टीम ने पता लगाया है कि नेपाल में लैंगटांग लिरुंग चोटी के पास एक ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूट गया. यह बाढ़ वाली जगह से लगभग 15 किलोमीटर पश्चिम में है.
उन्होंने अनुमान लगाया कि ग्लेशियर उत्तर-पश्चिम दिशा में टूटा और फिर पश्चिम की ओर नदी के बहाव में गिर पड़ा.
इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के एक विश्लेषण के मुताबिक़, ये शायद आईस-रॉक के मिश्रण का एवलांच था.
इसके कारण बर्फ़ और चट्टानों का बड़ी मात्रा में मलबा भोटेकोशी नदी की सहायक नदी लेंडे खोला में गिर गया. इसके बाद नदी में अचानक बाढ़ आ गई. नदी का पानी गाद और बड़े-बड़े पत्थरों को बहाकर नीचे की ओर ले गया.
आईसीआईएमओडी ने पाया कि निचले इलाकों में नदियों का जलस्तर आधे घंटे के अंदर सात से नौ मीटर तक बढ़ गया और कई जल निगरानी केंद्र तक बह गए या क्षतिग्रस्त हो गए.
ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में अर्थ साइंस के प्रोफ़ेसर माइक सर्ल ने कहा कि भूस्खलन से लेकर बाढ़ तक की यह पूरी प्रक्रिया घंटों या यहां तक कि कई दिनों तक चल सकती थी.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मलबे के विशाल सैलाब से पता चलता है कि पहले भूस्खलन हुआ होगा, पानी जमा हुआ होगा, नदी पर बांध बन गया होगा, और फिर एक भीषण बाढ़ के रूप में वह फूट पड़ा होगा."
क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ने भी बाढ़ को और अधिक गंभीर बना दिया. सर्ल ने बताया कि लैंगटांग लिरुंग ऊंचे हिमालय की चोटी पर स्थित है और पहाड़ के दोनों ओर 'बेहद खड़ी घाटियां' हैं, जिनसे पानी तेज़ गति से बह सकता था.
सर्ल ने कहा कि हिमालय के बाकी हिस्सों की तरह, लैंगटांग लिरुंग लंबे समय से टेक्टोनिक (भूगर्भीय) हलचल के कारण धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है. टेक्टोनिक हलचल में एक प्लेट दूसरी प्लेट को ऊपर धकेल रही है. उनके अनुसार, "यह ऐसा है जैसे कार के नीचे जैक लगाकर उसे ऊपर उठाना."
"जैसे-जैसे पहाड़ ऊपर उठता है, ग्लेशियर और भी अधिक ढलान वाला होता जाता है, और यह निश्चित है कि इसके कुछ हिस्से टूटकर गिर जाएं."
उन्होंने कहा कि लेकिन आमतौर पर ये छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं जो नदियों को अस्थायी रूप से रोकते हैं और बाद में आसानी से बह जाते हैं.
हालांकि, इस आपदा में, पूरा ग्लेशियर एक ही झटके में टूट गया लगता है, जिसे सर्ल ने 'बहुत असामान्य' बताया.वो कहते हैं, "ऐसी बाढ़ अक्सर आती रहती है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नहीं."
उन्होंने कहा कि 26 अगस्त की घटना शायद 'दो अलग-अलग प्रक्रियाओं' के कारण हुई.
पहला, हिमालय के ऊपर उठने में टेक्टोनिक हलचल और दूसरा, बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने के साथ जलवायु परिवर्तन की भी भूमिका रही होगी.
"ये सभी फ़ैक्टर मिलकर उन विनाशकारी आपदाओं को जन्म दे रहे हैं जिन्हें हम अब नियमित रूप से देख रहे हैं."
वैज्ञानिक, सालों से जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में बर्फ़ और पर्माफ्रॉस्ट (सदियों पुरानी जमी हुई मिट्टी) के पिघलने की चेतावनी देते रहे हैं.
साल 2000 की तुलना में दोगुनी रफ़्तार से बर्फ़ हट रही है. इससे बाढ़ जैसे ख़तरे और भी बढ़ जाते हैं.
डॉ. कुक ने बताया कि हाल के सालों में भारत, स्विट्जरलैंड और इटली में ग्लेशियरों के टूटने से बाढ़ और भूस्खलन की ऐसी ही घटनाएं हुई हैं.
साल 2021 में, उत्तर भारत की चमोली घाटी में हिमालयी ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूट गया, जिससे मलबे और पानी का सैलाब उमड़ पड़ा. इस घटना में लगभग 200 लोगों की मौत हो गई.
वैज्ञानिकों ने बाद में अनुमान लगाया कि इस हिमखंड के ढहने का असर '15 परमाणु बमों' के बराबर था.नेपाल में भी पिछले साल तिब्बत में एक हिमनद झील के फटने के कारण बाढ़ आई थी.
जलवायु परिवर्तन का असर
आईसीआईएमओडी के विशेषज्ञ मोहम्मद फारूक़ आज़म ने कहा, "क्रायोस्फीयर (पृथ्वी के जमे हुए हिस्सों) में ख़तरों का बार बार आना 'पहले से कहीं अधिक हो रहा है. बदलाव की गति बहुत तेज़ है."
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि कोई एक घटना जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है या नहीं.
डॉ. कुक ने कहा, "जब आप इन घटनाओं के पैटर्न को देखते हैं, तो आपको लगता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हो सकता है."
"तर्क यह है कि पृथ्वी के गर्म होने से बर्फ़ पिघलेगी और ग्लेशियर सिकुड़ेंगे. कुछ पर्वतों को आंशिक रूप से थामे रखने वाली पर्माफ्रॉस्ट (सदियों पुरानी मिट्टी) गर्म हो रही है, पिघल रही है और ख़राब हो रही है."
"इसलिए आपको अधिक भूस्खलन, मलबे का सैलाब, हिमनदों का पिघलना, झीलों का फटना, हिमनदों के टूटने जैसी घटनाएं देखने को मिलेंगी, क्योंकि जलवायु परिवर्तन अंततः इन उच्च पर्वतीय इलाकों को अस्थिर कर देता है."
आपदा के संभावित कारणों के बारे में इंटनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट से जुड़े नेपाली वैज्ञानिक शाश्वत सान्याल इस बारे में कई बातें बताई. काठमांडू में रहने वाले जलवायु रिसर्च ग्रुप के वैज्ञानिक सान्याल कहते हैं कि आपदा के ठोस कारण अभी पता नहीं चले हैं, लेकिन शुरुआती जानकारियां कुछ संकेत दे रही हैं. मसलन, आपदा केंद्र से जुड़ी नदियों में आधे घंटे के भीतर जलस्तर 29.5 फीट बढ़ गया. सान्याल के मुताबिक, "यह बहुत ही ज्यादा वृद्धि थी, वो भी इतने कम समय में जलस्तर में इतना बड़ा इजाफा."
प्राथमिक सबूत संकेत दे रहे हैं कि ल्हेदे खोला में विशाल मात्रा में बर्फ और पत्थर गिरे. ल्हेदे खोला, भोते कोशी नदी में मिलता है और ये नदी आगे जाकर त्रिशूली नदी में घुलती है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस अथाह मलबे ने पानी में एक भीषण छपाक पैदा की. इस छपाक के साथ पानी, कीचड़ और बोल्डरों से भरा मलबा भारी मात्रा में उछला और तबाही शुरू हुई.
वैज्ञानिक अभी इस बात के भी सबूत जुटा रहे हैं कि क्या इस मलबे ने भूते कोशी नदी को कुछ देर के लिए बांध दिया और जब वह अस्थायी बांध फटा तो तबाही और विकराल हो गई.
प्रस्तुति: मैगबुक