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‘अमृत कुम्भ’ उपन्यासात्मक शैली में रचा गया है, जिसमें कथा का केन्द्र एक युवक है, जो इसरो में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत है। एक अनपेक्षित अवसर उसे एक ऐसे विद्यालय में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों से संवाद करने का मौका देता है, जिसकी फाउंडर का उद्देश्य बच्चों को धर्म, संस्कृति और राष्ट्र से जोड़ना था, पर वो इसमें विफल रही थीं। अत: उस युवक के सामने चुनौती थी, बच्चों को उस उद्देश्य के लिए तैयार करना और वो इस चुनौती को स्वीकार करता है। वहाँ वो हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू सभ्यता और राष्ट्र को लेकर बच्चों के मन में उठ रहे प्रश्नों और शंकाओं का समाधान करता है और हिन्दू धर्म पर उन्हें एक नवीन दृष्टि देता है। पुस्तक का नाम स्वामी विवेकानंद के उस विचार से प्रेरित है, जिसमें उन्होंने हिन्दू सभ्यता को जीवित रखने वाले ‘अमृत कुम्भ’ का उल्लेख किया था, जिसे हिन्दुओं को दुनिया को देना है और जिसे दिए बना वो नष्ट नहीं हो सकता।